Ticker

6/recent/ticker-posts

Header Ads Widget

Responsive Advertisement

क्या है गणेश जी के हाथी के माथा होने की कहानी


    क्या है गणेश जी के हाथी के माथा होने
               की कहानी

गणेश जी को हर शुभ काम करने से पहले उनको याद किया जाता है पूजा की जाती है. गणपति हमारी सारे दुःख – दर्द को हरते हैं इसलिए इनको विघ्नहर्ता कहा गया है. क्या आप जानते हैं उनका शरीर तो मानव का है लेकिन सर हाथी का है ? इसके पीछे भी एक कहानी जुडी हुई है. तो आइए चलते हैं उस टॉपिक पर.

एक बार की बात है माता पार्वती अपने पुत्र गणेश से बोली – “पुत्र गणेश! मैं स्नान करने जा रही हूँ तुम्हें यहीं दरवाजे पर बैठ कर पहरेदारी करना है, ध्यान रहे कोई अन्दर ना आ पाए, ये रहे तेरे लड्डू और डंडे. यहीं बैठे लड्डू खाओ और किसी को भी अन्दर आने मत देना”. “जैसी आपकी आज्ञा माते!” गणेश जी बोले. और उसके बाद माता पार्वती स्नान करने चली गयी. गणेश जी आराम से लड्डू खा रहे थे और वहीँ बैठे माता की आज्ञा का पालन कर रहे थे. तभी कुछ देर बाद भगवान शिव जी आए और अन्दर जा ही रहे थे तब तक गणेश जी ने द्वार रोक ली और बोले - "आप अभी अन्दर नही जा सकते."
शिव जी बोले - "क्यों नही जा सकता ?"
गणेश जी - "अभी माता स्नान कर रही हैं इसलिए अन्दर कोई नही जा सकता."
दोनों में विवाद शुरू हो गया.
शिव जी - "मुर्ख बालक तुम मुझे नही जानते, मैं शिव हूँ अति हठ मत करो मुझे अन्दर जाने दो.
गणेश जी - "शिव हो या शंकर. अभी अन्दर कोई नही जा सकता.
शिवजी नही माने और अन्दर की तरफ जाने लगे, तभी गणेश जी ने माता पार्वती के द्वारा दिया हुआ शक्तिशाली डंडे से शिव जी को रोकने का प्रयास किए.
    दोनों में युद्ध शुरू हो गयी. ये युद्ध देख कर देवलोक के सारे देवता पधारे. भगवन विष्णु बोले - मुर्ख बालक ये तुम क्या कर रहे हो ? गणेश जी उनपे भी अपना डंडा बरसाने लगे. इसी तरह और भी देवता के पास हुआ, जो लोग वहाँ आये हुए थे. परन्तु गणेश जी ने सभी को अपने डंडे से परास्त कर दिए अंत में शिव जी क्रोधित हो कर अपना त्रिशूल उठाये और उस बालक का सर धड़ से अलग कर दिए.
    ये भयंकर शोर पुरे ब्रहमांड में गूंज उठी. माता पार्वती दौड़ कर बाहर आई, तब देखती है कि उनका पुत्र का सर और धड़ जमीन पर अलग - अलग जगह पड़ा हुआ है. सारे देवता भी वहाँ पधारे हुए हैं और भगवन शिव के हाथ में त्रिशुल है.
    "पुत्र! पुत्र गणेश! ये क्या हो गया पुत्र!" - रोती - बिलखती हुई, चिल्लाती  हुई आई. यह सब देख कर सारे देवता भ्रमित में पड़ गये और बोले - "देवी! पुत्र गणेश!  ये क्या है ?"
पार्वती - "हाँ ये मेरा पुत्र गणेश है. मैं स्नान के लिए गयी थी और इसे पहरा में रहने के लिए बोली थी. परन्तु यहाँ .....? यहाँ तो कुछ और है. कैसे हुआ ये सब ? किसने किया ? "
    सारी घटना बताई गयी.
पार्वती - "स्वामी आप तो त्रिलोकीनाथ हैं! देवों के देव महादेव हैं आप! क्या त्रिलोकीनाथ को एक बालक से युद्ध करना शोभा देता है ? क्या महादेव अब नादान बालक से भी युद्ध करने लग गये ? "
    सारे देवता बिलकुल शांत हो गये.
    माता पार्वती क्रोधित हो कर अपना दुर्गा - काली का रूप धारण कर ली. सभी देवता परेशान हो गये. और माता से शांत होने का आग्रह करने लगे. माता पार्वती बोली - "जिसने मेरे पुत्र की यह दशा की है, कुशल - मंगल चाहते हैं तो उसे अभी जीवित कीजिये." भगवान शिव बोले - "देवी यह तो नही हो सकता परन्तु एक हल है मेरा इस त्रिशूल से जिस भी प्राणी का सबसे पहले भेंट हो वही प्राणी का सर गणेश का सर होगा. इतना कह कर शिव जी ने अपना त्रिशूल छोड़ा. कुछ ही क्षण में एक हाथी का सर त्रिशूल के साथ आया और गणेश जी के धड़ से जुट गया और गणेश जी उठ खड़े हुए. माता पार्वती ने अपने पुत्र को गले लगाया. सभी देव जय - जयकार करने लगे.
तो दोस्तों इस तरह से गणपति का सर हाथी का सर हुआ. अगर ये पोस्ट मेरी आपको अच्छा लगा हो तो कमेंट में जरुर बताइए और अगर आप भी कुछ गणेश जी के बारे में जानते हैं तो जरुर बताइए.
                        धन्यवाद!

Post a Comment

0 Comments